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'अपराध की गंभीरता' के आधार पर किशोर को जमानत से वंचित नहीं किया जा सकता- पटना HC
Patna : पटना हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया कि'अपराध की गंभीरता'के आधार पर किशोर को जमानत से वंचित नहीं किया जा सकता है. कोर्ट ने बाल न्याय अधिनियम सर्वोपरि माना है. भारतीय न्यायपालिका ने किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015का मंशा उद्देश्य और उसके प्रावधानों पर एक बार फिर कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है.
हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल अपराध की गंभीरता या जघन्य प्रकृति के आधार पर किसी भी'विधि के विवादित बालक'को जमानत देने से इनकार नहीं किया जा सकता है.
कोर्ट ने साफ शब्दों में दोहराया है कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा12 आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC/BNSS)के सामान्य जमानत प्रावधानों पर भारी पड़ती है. कानून के मुताबिक,किशोर को जमानत देना एक'नियम'है और इसे अस्वीकार करना केवल एक'अपवाद'है.
हाल ही में अदालतों के सामने ऐसे कई मामले आए जहां निचली अदालतों ने आरोपी किशोरों की जमानत याचिकाएं केवल इस आधार पर खारिज कर दी थी कि उनके खिलाफ दर्ज अपराध बहुत गंभीर या जघन्य प्रकृति के थे.
अदालतों में यह दलील दी जा रही थी कि चूंकि मामला बेहद गंभीर अपराध से जुड़ा है,इसलिए आरोपी किशोर को राहत नहीं दी जानी चाहिए.
लेकिन हाईकोर्टों ने इन तर्कों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि कानून की मूल भावना बच्चे को अपराधी की श्रेणी में खड़ा करना नहीं,बल्कि उसका सुधार करना है.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब बात किसी किशोर को जमानत देने की आती है,तो अपराध कितना गंभीर है या उसमें कितनी हिंसा शामिल है,यह पैमाना नहीं होना चाहिए. कानून हर किशोर को समान रूप से देखता है. जेजे एक्ट की धारा12(1)के तहत यह साफ निर्देश है कि विधि के विवादित बालक को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए,चाहे उसने कोई भी अपराध क्यों न किया हो.
जमानत से इन्कार कानून के अनुसार,किसी किशोर को तभी जमानत से रोका जा सकता है,जब इसके पुख्ता आधार हों कि रिहा होने पर उसका संपर्क किसी ज्ञात अपराधियों से हो जाएगा.
इससे उसे नैतिक,शारीरिक या मनोवैज्ञानिक खतरा पैदा हो सकता है.
फिर उसकी रिहाई से'न्याय के उद्देश्यों को आघात' पहुंचेगा.
(ध्यान रहे: यहाँ'न्याय के उद्देश्य'का अर्थ समाज का बदला लेना नहीं,बल्कि उस बच्चे के अपने सुधार और कल्याण से जुड़ा है.)
यदि किसी मामले में पुलिस या अभियोजन पक्ष गवाह पेश करने में देरी करता है या कानूनी प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब होता है,तो इसका खामियाजा किशोर को उसकी स्वतंत्रता छीनकर नहीं भुगताया जा सकता.
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि एक ऑब्जर्वेशन होम या सुधार गृह की चारदीवारी की तुलना में,एक सही पारिवारिक और सामाजिक माहौल बच्चे के मानसिक,भावनात्मक और सामाजिक विकास के लिए कहीं अधिक बेहतर और सहायक होता है.
यह फैसला बच्चों के बुनियादी अधिकारों की जीत है. कानूनी जानकारों का मानना है कि यह निर्णय बाल न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांतों की पुनर्स्थापना करता है. कई बार निचली अदालतें जनता के आक्रोश या अपराध की क्रूरता को देखकर कानून की मूल मंशा से भटक जाती हैं और बच्चों को जेलनुमा सुधार गृहों में लंबे समय तक बंद रखने का आदेश दे देती हैं.
इस फैसले से उन हजारों किशोरों और उनके परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी,जो केवल प्रशासनिक या अदालती प्रक्रियाओं की सुस्ती के कारण महीनों और सालों से हिरासत में रहने को मजबूर हैं.
पटना से आनंद वर्मा की रिपोर्ट-
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