PATNA- बिहार की राजनीति में एक बड़ा चर्चित नाम रहा निवर्तमान केन्द्रीय इस्पात मंत्री रामचन्द्र प्रसाद सिंह उर्फ आरसीपी सिंह का. पिछले करीब दो दशक से बिहार की सत्ता के गलियारे में अपनी खास धमक रखने वाले पूर्व आईएएस अधिकारी आरसीपी का चैंबर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चैंबर के बगल में तो था ही हर समय साये की तरह नीतीश जी के साथ ही रहते थे. 2005 में बिहार की सत्ता संभालने के बाद नीतीश के शासन में कदम से कदम मिलाकर नीतीश बाबू ( जो आर सी पी अपने हर संबोधन में कहते थे) के साथ साये की तरह चल रहे आरसीपी के काम काज से नीतीश इतना प्रभावित हुए कि उन्होनें जुलाई 2010 में अधिकारी से नेता बनाते हुए राज्य सभा भेज दिया. फिर तो आरसीपी दिल्ली में भी नीतीश के प्रतिनिधि के रूप में सत्ता के गलियारे में ही नही संगठन का काम काज भी देखने लगे.

2020 में लोकसभा चुनाव के बाद आरसीपी के जिम्मे नीतीश ने पूरी पार्टी ही सौंप दी और खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ आरसीपी को ही जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया. यानि पार्टी का सर्वे सर्वा. लेकिन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही आरसीपी के लिये संकट की शुरऊआत होने लगी. शायद यही वजह रही कि 2019 में संख्या बल के अनुपात में केन्द्रीय मंत्रिमंडल में अपनी भागीदारी मांगने वाली जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह जुलाई 2021 में अकेले केन्द्रीय मंत्री बने. हालांकि उस समय यह चर्चा जोरों पर थी कि नीतीश अभी भी संख्या बल के अनुपात ही जदयू की भागीदारी चाहते हैं और इसकी वजह भी थी कि एक तरफ नीतीश के राजनीति के सबसे पुराने साथी ललन सिंह और पारिवारिक और सबसे भरोसे मंद आरसीपी दोनों में से किसी एक को छोड़ना नही चाहते थे. लेकिन हुआ उल्टा आरसीपी मंत्री बन गये और ललन सिंह छूट गये. हाालंकि उस समय भी आरसीपी ने दावा किया था कि वे नीतीश जी की मर्जी से ही केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हुए है. लेकिन नीतीश जी की नारजगी का असर साफ तौर पर दिखा और आरसीपी को अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा और नीतीश ने ललन सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर उनके गुस्से को शांत किया.

ललन सिंह को जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के बाद भी आरसीपी नीतीश को समझ नही पाये और खुद उन्होनें पार्टी से अलग राह पकड़ी. ललन सिंह के समानांतर पटना में अपना अभिनंदन कराना और फिर ललन सिहं के विरोधियो को अपने पास रखने से नीतीश भी असमंजस में दिखे. इसका असर भी देखने को मिला. एक तरफ जहां आरसीपी के खिलाफ जदयू में मोर्चेबंदी शुरू हुई और एक एक करके उनके समर्थको को पार्टी संगठन से बेदखल किया ही नही गया जिन्होनें आरसीपी खेमें से पाला बदला और ललन सिंह के साथ दिखे उन्हें संगठन में महत्वपूर्ण पद से नवाजा किया. लेकिन तब तक भी आरसीपी नीतीश को समझ नही पाये. जिसका अंतिम परिणाम यह हुआ कि पहले जदयू पोस्टर से आरसीपी गायब हुए बाद में राज्यसभा और केन्द्रीय मंत्रिमंडल से भी विदाई हुई.

आखिर क्या वजह रही कि जुलाई 2021 को नीतीश की कृपा से पीएस टू मिनिस्टर के बदले खुद कैबिनेट मंत्री बने आरसीपी ( जैसा कि वह खुद कहते हैं) ठीक एक साल के अंदर ऐसा क्या हुआ कि वे अर्श से फर्श पर आ गये. राजनीतिक पंडित मानते है कि जिस नीतीश ने उन्हें अर्श पर पहुंचाया उन्होनें ही जब आंखे तरेर ली तो फिर फर्श पर आने के अलावे कोई रास्ता था क्या. हालांकि आर सी पी लगातार नीतीश नाम केवलम जपते रहे लेकिन वे बिहार की राजनीति के चाणक्य नीतीश कुमार को शायद समझ नही पाये. हालांकि ऩीतीश के साथ ही अधिकार से राजनेता बने आरसीपी को शायद इसका तनिक भी भान नही था कि नीतीश उन्हें फर्श पर पहुंचा देंगे. नीतीश के साथ ढाई दशक से ज्यादा समय गुजारने वाले आरसीपी ने शतरंज की चाल तो बहुत ही सध के चली लेकिन नीतीश के सामने मात खा गये.

फिलहाल केन्द्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफे के बाद आर सी पी मौन है. शायद कोई नयी चाल चलने की तैयारी में लगे हो वजह साफ है उनके राजनीतिक विरोधियो ने यह संदेश देने मे कामयाबी हासिल कर ली है कि आरसीपी अब नीतीश से काफी दूर चले गये हैं.

अशोक मिश्रा , कशिश न्यूज .