BIHAR
खामोश धागे, बेज़ुबान काठ, क्या इतिहास के पन्नों में खो जाएगी कठपुतली?
कठपुतली का इतिहास काफी पुराना है. महान महर्षियों की पुस्तक और कई प्रामाणिक जगहों पर इसका उल्लेख मिलता है. इसकी शुरुआत जहां से भी हुई हो लेकिन ये कला सालों पुरानी है. बदलते दौर के साथ इस कला में भी काफी बदलाव आया. आधुनिकीकरण के इस युग में जहां इस कला को और विकसित होना चाहिए. वही यह कला पिछड़ता जा रहा है. और कठपुतली कला धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही है।
मनोरंजन के साथ संदेश देने का मजबूत माध्यम
धागे और बेज़ुबान काठ के जरिए लोगों तक मनोरंजन के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश पहुंचाने वाली यह परंपरा अब पहले जैसी दिखाई नहीं देती।कठपुतली भारत की पारंपरिक कथा-कथन परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। संगीत, संवाद, गायन और दृश्य प्रस्तुति के माध्यम से कलाकार नैतिक संदेशों को लोगों तक पहुंचाते रहे हैं. भारत में कठपुतली की अलग-अलग क्षेत्रीय शैलियां रही हैं और इन परंपराओं का ज्ञान अक्सर पीढ़ी-दर-पीढ़ी कलाकार परिवारों के जरिए आगे बढ़ता रहा है।
आकर्षण का केंद्र हुआ करता था कठपुतली कला
बिहार के भी कई इलाकों में मेलों और धार्मिक आयोजनों के दौरान कठपुतली का मंच लोगों के आकर्षण का केंद्र हुआ करता था. कठपुतली केवल मनोरंजन का साधन नहीं थी. कलाकार अपनी प्रस्तुति में लोककथाओं और सामाजिक विषयों को शामिल करते थे. गायन और संवाद के साथ पुतलियों की गतिविधियों के जरिए ऐसी कहानियां प्रस्तुत की जाती थीं, जिन्हें दर्शक आसानी से समझ और याद रख सकें।
आधुनिक के दौर में बदला दर्शकों का रुझान
बदलते दौर में टेलीविजन, मोबाइल फोन, इंटरनेट और डिजिटल मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव ने इस लोक कला के सामने नई चुनौती खड़ी की है. कठपुतली कला के जानकार बताते है कि बदलते दर्शक और मनोरंजन के दूसरे माध्यमों के दबाव के कारण कई कठपुतली कलाकारों ने प्रस्तुतियों की अवधि कम की है और कुछ कलाकारों ने दूसरे पेशों का रुख भी अख्तियार कर लिया है।
नई पीढ़ी को भी जुड़ना जरूरी
कठपुतली कला को बचाने के लिए केवल पुराने मंचों को याद करना पर्याप्त नहीं है. जरूरत है कि इस कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए. स्कूलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, मेलों और लोक उत्सवों में कठपुतली प्रस्तुतियों को जगह मिलने से कलाकारों को मंच और दर्शक दोनों मिल सकते हैं। अगर समय रहते इसे संरक्षण और नए मंच नहीं मिले, तो आने वाली पीढ़ियां इस कला को सिर्फ तस्वीरों और किताबों में ही देख पाएंगी।
स्पेशल रिपोर्ट: पटना डेस्क
इस ख़बर को शेयर करें
अपने दोस्तों और परिवार तक यह ख़बर पहुँचाएँ।