Live

JHARKHAND NEWS

झारखंड हाईकोर्ट का सख्त रुख: माओवादी हमले में 5 पुलिसकर्मियों की हत्या के आरोपी को नहीं मिली जमानत

S
Srishtyलेखक

झारखंड हाईकोर्ट ने दुमका के चर्चित काठीकुंड थाना कांड से जुड़े मामले में आरोपी राजकुमार भगत उर्फ राजकुमार भगत की जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने 30 सितंबर 2026 को यह फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया है।मामला काठीकुंड थाना कांड संख्या 55/2013 से संबंधित है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 2 जुलाई 2013 को पाकुड़ के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में जा रहे एक पुलिस दल पर प्रतिबंधित संगठन एमसीसी (MCC) के सदस्यों ने अंधाधुंध हमला कर दिया था। इस दर्दनाक घटना में तत्कालीन एसपी समेत पांच पुलिसकर्मियों की जान चली गई थी।इस मामले में आईपीसी की गंभीर धाराओं के साथ-साथ क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट, यूएपीए (UAPA) और आर्म्स एक्ट के तहत मुकदमे दर्ज किए गए थे। एफआईआर में शुरुआत में 4 लोगों को नामजद किया गया था, जबकि 28 से 30 अज्ञात माओवादियों का भी जिक्र किया गया था।इस कानूनी लड़ाई के तहत आरोपी राजकुमार भगत चार्जशीट दाखिल होने के बाद गिरफ्तार हुआ था और वह 7 नवंबर 2022 से न्यायिक हिरासत में है। इससे पहले भी उसने कई बार जमानत की कोशिश की, लेकिन हाईकोर्ट और निचली अदालत से उसे राहत नहीं मिली। 2 फरवरी 2026 के जमानत आदेश को चुनौती देते हुए यह ताजा क्रिमिनल अपील दाखिल की गई थी।

अपीलकर्ता के वकीलों ने दलील दी कि राजकुमार भगत का नाम मूल एफआईआर में नहीं था। उनके खिलाफ आपराधिक साजिश रचने, आर्थिक मदद करने या घटना को अंजाम देने से जुड़ा कोई ठोस सबूत नहीं है। उनके पास से कोई आपत्तिजनक सामान भी बरामद नहीं हुआ और न ही कोई ऐसा डिजिटल या वित्तीय रिकॉर्ड मिला जो उन्हें प्रतिबंधित संगठन से जोड़े। साथ ही यह भी कहा गया कि मामले के 46 गवाहों में से अब तक केवल 12 की ही गवाही हो पाई है, जिससे सुनवाई लंबी खिंच रही है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने तमाम दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने केस डायरी के पैराग्राफ 150 और 151 का हवाला दिया, जिसमें स्वतंत्र गवाहों ने राजकुमार भगत का नाम लिया था। गवाहों के अनुसार, उसने घटना से ठीक तीन दिन पहले यानी 29 जून 2013 को दुमका के जामनी में हुई एक गुप्त बैठक में हिस्सा लिया था, जहां बड़े अपराध की साजिश रची गई थी। इसी अहम सामग्री के आधार पर हाईकोर्ट ने पहले भी उसकी जमानत नामंजूर की थी।

इसके अलावा, बचाव पक्ष ने सह-आरोपियों को मिली जमानत का हवाला देते हुए 'पैरिटी' यानी समानता का लाभ मांगा, जिसे खंडपीठ ने अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ किसी अन्य आरोपी को जमानत मिलने से स्वतः समानता का आधार नहीं बनता, बल्कि हर आरोपी की भूमिका और उसके खिलाफ उपलब्ध सबूतों का अलग से आकलन किया जाना जरूरी है।


इस ख़बर को शेयर करें

अपने दोस्तों और परिवार तक यह ख़बर पहुँचाएँ।

पूरी वेबसाइट पर पढ़ें और ख़बरें