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गुमला की अनूठी मिसाल: 65 सालों से हिंदू, मुस्लिम और ईसाई मिलकर मना रहे हैं दुर्गा पूजा

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Srishtyलेखक

झारखंड के गुमला जिले का रायडीह प्रखंड... और यहाँ का नवागढ़ पतराटोली गाँव। एक ऐसा गाँव, जो आज पूरे देश के लिए सामाजिक सद्भाव और आपसी भाईचारे की सबसे बड़ी मिसाल बन चुका है!यहाँ दुर्गा पूजा की परंपरा कोई एक-दो साल पुरानी नहीं, बल्कि पूरे 65 वर्षों से यानी साल 1961 से लगातार कायम है। ज़रा सोचिए, जिस पूजा की शुरुआत महज 372 रुपये की लागत से हुई थी, वह आज एक भव्य और विशाल आयोजन का रूप ले चुकी है।लेकिन इस पूजा की सबसे खूबसूरत और खास बात क्या है जानते हैं? इसकी शुरुआत किसी एक धर्म के लोगों ने नहीं, बल्कि हिंदू, मुस्लिम और ईसाई – तीनों समुदायों के लोगों ने मिलकर की थी! और आज 6 दशक बीत जाने के बाद भी, आज भी यहाँ हर समुदाय के लोग कंधे से कंधा मिलाकर इस महापर्व को मनाते हैं।

चलते हैं साल 1961 के उस दौर में... पूजा समिति के संरक्षक डिनर कुमार लाल बताते हैं कि तब प्लास्टिक की एक छोटी सी छपरी बनाई गई थी और लकड़ी की चौकी पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई थी।संसाधन भले ही कम थे, लेकिन हौसले बुलंद थे। उस दौर में मेले लगते थे, रात को गाँव के लोग खुद नाटक प्रस्तुत करते थे और पूरे गाँव वाले श्रमदान व आपसी सहयोग से इस आयोजन को सफल बनाते थे।इस महान शुरुआत के पीछे बिंदेश्वरी प्रसाद साहू, झरी साहू, सोहराई साहू, रेयासत हुसैन और पन्नालाल राय जैसे दूरदर्शी लोगों का अहम योगदान रहा, जिन्होंने मिलजुलकर यह साबित कर दिया कि आस्था की कोई सीमा नहीं होती।

समय बदला, तौर-तरीके बदले, और आज इस आयोजन का स्वरूप बेहद भव्य हो चुका है। समिति के अध्यक्ष ब्रजेश कुमार लाल गर्व से कहते हैं कि हमारे पूर्वजों की दी हुई यह परंपरा आज भी पूरी शान से आगे बढ़ रही है—आज भी भाईचारा वैसा ही अटूट है।इस साल के आयोजन की बात करें तो, समिति के सचिव राजेंद्र साहू के अनुसार, इस बार पूजा पर 5 से 6 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान है।

नवागढ़ पतराटोली की यह दुर्गा पूजा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हमारे देश की 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' की एक ऐसी जीवंत तस्वीर है, जो दिल को छू लेती है।पूजा समिति ने सभी से अपील की है कि इस महापर्व में शामिल हों और इस अनोखे भाईचारे के साक्षी बनें।

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