JHARKHAND NEWS
मनरेगा में 3.11 लाख की गड़बड़ी: झारखंड हाईकोर्ट से ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर को नहीं मिली राहत
झारखंड हाईकोर्ट से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। अदालत ने मनरेगा घोटाले से जुड़े एक मामले में तत्कालीन ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर को बड़ा झटका दिया है। झारखंड हाईकोर्ट ने मनरेगा योजना के तहत तीन लाख से अधिक के कथित गबन के मामले में तत्कालीन ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर सुष्मिता प्रिया (उर्फ सुष्मिता गुप्ता) को राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय की अदालत ने उनकी आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा है। साल 2018 में मांडर थाने में कांड संख्या 109/2018 के तहत यह मामला दर्ज किया गया था। आरोप था कि मनरेगा के तहत जलेश्वर लोहरा की जमीन पर ट्यूबवेल निर्माण के लिए 3 लाख 11 हजार 244 रुपये स्वीकृत किए गए थे। लेकिन, निर्धारित स्थान पर काम न करवाकर राशि का दुरुपयोग किया गया। जांच के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और ट्रायल कोर्ट ने आईपीसी की धाराओं के तहत इसका संज्ञान लिया था। अदालत में बचाव पक्ष के वकील मुकेश कुमार सिन्हा ने दलील दी कि सुष्मिता प्रिया मार्च 2010 से सितंबर 2012 तक संविदा पर तैनात थीं। उनका तर्क था कि स्थल निरीक्षण, जमीन की पहचान और सत्यापन की मुख्य जिम्मेदारी जूनियर इंजीनियर, हल्का कर्मचारी और मेट की होती है। याचिकाकर्ता की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी और नियमों के तहत गलत जगह निर्माण होने पर राशि वसूली का प्रावधान है, इसलिए उन्हें आपराधिक मुकदमे से मुक्त किया जाना चाहिए।
वहीं, राज्य सरकार के वकील ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर होने के नाते वे परियोजना की मुख्य निगरानी अधिकारी थीं।
केस डायरी और संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट का हवाला देते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने यह माना कि ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर के दायित्वों में चल रही परियोजनाओं की नियमित निगरानी करना शामिल है, जिसका निर्वहन नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद बयानों और साक्ष्यों से उनकी भूमिका स्पष्ट रूप से सामने आती है, और इसी के साथ अदालत ने उनकी डिस्चार्ज याचिका खारिज कर दी।
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