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शहीदों के सम्मान से कतराते राजनेताओं

प्रवीण बागी 

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कश्मीर में आतंकियों से लोहा लेते शहीद हुए  जवान मो. मोजाहिद खां के अंतिम संस्कार के समय जब पीरो के लोग पकिस्तान से बदला लेने के नारे लगा रहे थे , उस समय जिले के प्रभारी मंत्री विनोद सिंह वेलेंटाइन दे मन रहे थे ! यह वाकया बिहार का है।  जवान अपना कर्तव्य निभाते हुए शहादत दे रहे हैं ,लेकिन हमारे मंत्री और राजनेता उन्हें सम्मान देने का कर्तव्य नहीं निभा रहे। श्रीनगर में आतंकवादियों के हमले में शहीद सीआरपीएफ के 49वीं बटालियन के जवान मो. मोजाहिद खां का पार्थिव शरीर आज आरा के पीरो में सुपुर्दे ख़ाक कर दिया गया। वे इसी गांव के रहनेवाले थे। शहीद को श्रद्धांजलि देने के लिए हज़ारों की संख्या में लोग अंतिम यात्रा में शमिल हुए लेकिन कोई जनप्रतिनिधि नहीं पहुंचा। इससे लोगों में आक्रोश है। उस क्षेत्र से माले के सुदामा प्रसाद विधायक हैं। बीजेपी के विनोद सिंह जिले के प्रभारी मंत्री हैं। लेकिन किसी ने शहीद के सम्मान में वहां उपस्थित रहना जरुरी नहीं समझा। 

ऐसा ही कल खगड़िया में हुआ। खगड़िया के ब्रम्हा गांव के किशोर कुमार मुन्ना पुंछ में आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हुए थे। वे सेना के जवान थे। मंगलवार को उनके पैतृक गांव में उनका दाह -संस्कार पूरे सम्मान के साथ किया गया। लेकिन यहाँ भी क्षेत्रीय विधायक और  जिले के प्रभारी मंत्री  मौजूद नहीं थे। जेडीयू के पन्नालाल पटेल यहाँ के विधायक हैं। पंचायती राज मंत्री कपिलदेव कामत  खगड़िया के प्रभारी मंत्री हैं।  पटना हवाई अड्डे पर भी राज्य का कोई मंत्री शहीदों को सम्मान देने के लिए उपस्थित नहीं हुआ। नेताओं की उपस्थिति से शहीद जवान वापस नहीं आ सकते लेकिन उनकी मौजूदगी का मनोवैज्ञानिक असर सेना और शहीद के परिजनों पर पड़ता है। इससे आम लोगों में सेना के प्रति सम्मान बढ़ता है। कुछ वर्ष पहले तत्कालीन मंत्री भीम सिंह ने बयान दिया था कि सेना में लोग मरने के लिए ही जाते हैं।  एक अन्य मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव ने भी पिछले वर्ष कहा था कि बिहार में ऐसी कोई परम्परा नहीं है कि शहीद के अंतिम संस्कार में मंत्री शामिल हो। तब उनकी राष्ट्रव्यापी आलोचना हुई थी। लगता है इससे भी नेताओं ने कोई सबक नहीं सीखा।शहीद को सम्मान देना राष्ट्रीय कर्तव्य है। मगर बिहार के राजनेताओं को कौन समझाये ? पडोसी राज्य झारखंड में राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू और मुख्यमंत्री रघुवर दास रांची आनेवाले हर शहीद के पार्थिव शरीर को श्रद्धांजलि देने के लिए खुद मौजूद रहते हैं। क्या बिहार के राजनेता इससे कुछ सीखेंगे ?   

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